आँखों को थोड़ा भिगा कर देखिए… पत्थर दिल पिघल जाएगा
कहीं मिलेगी प्रशंसा.. तो,
कहीं नाराजगियों का बहाव मिलेगा..
कहीं मिलेगा आशिर्वाद.. तो,
कहीं भावनाओं में दुर्भाव मिलेगा..
तू चलाचल राही अपने कर्मपथ पे,
‘जैसा तेरा भाव’ वैसा ‘प्रभाव’ मिलेगा..
मस्तक को थोड़ा झुकाकर देखिए…
अभिमान मर जाएगा
आँखों को थोड़ा भिगा कर देखिए…
पत्थर दिल पिघल जाएगा
दांतों को आराम देकर देखिए…
स्वास्थ्य सुधर जाएगा
जिव्हा पर विराम लगाकर देखिए…
क्लेश का कारवाँ गुज़र जाएगा
इच्छाओं को थोड़ा घटाकर देखिए…
खुशियों का संसार नज़र आएगा..
जिस इंसान में अच्छे विचार एवं
अच्छे संस्कारो की पकड़ होती है,
उसे हाथ में
“माला पकड़ने की जरूरत नहीं पड़ती”
“अकाल” हो अगर “अनाज” का,
तब “मानव” मरता है…
किन्तु
“अकाल” हो अगर “संस्कारों” का,
तो “मानवता” मरती है!!!
“संस्कारों” से बड़ी कोई “वसीयत” नहीं..
और “र्इमानदारी” से
बड़ी कोई “विरासत नहीं !!!भय से तब तक ही डरना चाहिए जब तक भय निकट न आया हो। भय को निकट देखकर बिना शंका के उस पर प्रहार कर उसे नष्ट कर देना चाहिए। अर्थात भय से सदा दूर रहें। निर्भय बनें।
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